Wednesday, August 15, 2018

एक अरसे बाद

तो यूं कहूँ कि लगभग छह वर्ष बाद, वही उथलपुथल मन में दोबारा मची और फिर से कुछ बोल जाने को मेरी उंगलियां चंचला उठीं | 

"बोल, के लब आज़ाद हैं तेरे, बोल, ज़बां अबतक तेरी है |"

फैज़ साहब ने ये कुछ पंक्तियों में मेरे जैसों की लालसा को व्यक्त कर दिया । बोल । 

बोलना मेरा परम धर्म है । मुझे बोलने से जितना प्यार है उतना शायद ही किसी चीज़ से है। और यही कारण है कि अधिकतर वाचन प्रवचन की प्रतियोगिताओं में आप मुझे कुछ न कुछ बोलते-बकते पा सकते हैं । 
महाविद्यालय प्रौढ़-जीवन का बचपन ही होता है । अत: वहां मैं जहां भी बन पड़ता था, ध्वनि-विस्तारक-यन्त्र को पकड़ अपने आज़ाद लबों को जनता तक पहुंचाने का कार्य सिद्ध करने लगती थी । 

अब भी करती हूं पर वहीं ही जहां मन करे । आश्चर्यजनक है कि अब कोई ऐसी जगह भी है जहां मन ’नहीं’ करे बोलने को । जहां मैं सोचूं कि नहीं भी बोलना है । 

तो एक अरसे बाद यदि कुछ भी बदला है, तो वह है, ’जगह देखना’ :( 

खैर, यह जीवन है इस जीवन का, यही है, यही है, यही है... 


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