तो यूं कहूँ कि लगभग छह वर्ष बाद, वही उथलपुथल मन में दोबारा मची और फिर से कुछ बोल जाने को मेरी उंगलियां चंचला उठीं |
"बोल, के लब आज़ाद हैं तेरे, बोल, ज़बां अबतक तेरी है |"
फैज़ साहब ने ये कुछ पंक्तियों में मेरे जैसों की लालसा को व्यक्त कर दिया । बोल ।
बोलना मेरा परम धर्म है । मुझे बोलने से जितना प्यार है उतना शायद ही किसी चीज़ से है। और यही कारण है कि अधिकतर वाचन प्रवचन की प्रतियोगिताओं में आप मुझे कुछ न कुछ बोलते-बकते पा सकते हैं ।
महाविद्यालय प्रौढ़-जीवन का बचपन ही होता है । अत: वहां मैं जहां भी बन पड़ता था, ध्वनि-विस्तारक-यन्त्र को पकड़ अपने आज़ाद लबों को जनता तक पहुंचाने का कार्य सिद्ध करने लगती थी ।
अब भी करती हूं पर वहीं ही जहां मन करे । आश्चर्यजनक है कि अब कोई ऐसी जगह भी है जहां मन ’नहीं’ करे बोलने को । जहां मैं सोचूं कि नहीं भी बोलना है ।
तो एक अरसे बाद यदि कुछ भी बदला है, तो वह है, ’जगह देखना’ :(
खैर, यह जीवन है इस जीवन का, यही है, यही है, यही है...
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