Friday, April 6, 2012

जब वह दिन आया ....और चला गया !

अरे ! मैंने लिखना आरम्भ कर दिया ! पुन: !

इसे इश्वर का आशीर्वाद कहिये या किसी ख़ास व्यक्ति की हृदयज दुआ कि मेरी उँगलियाँ इस 'की-बोर्ड ' पर पुन: लिखने को तत्पर हो गयी क्योंकि हाल ही में उत्पन्न कतिपय व्यस्तताओं के कारण यह कार्य सर्वथा असंभव ही प्रतीत हो रहा था ।
खैर, 'कॉलेज डे ' समापन के लम्हे गुज़ार चुका है  । वह वार्षिक  दिवस जिस धैर्य के साथ समीप आ रहा था उतनी ही तीव्रता के साथ गुज़र भी गया । मैंने सोचा भी नहीं था कि यह दिन इस प्रकार इतनी जल्दी ही ख़त्म हो जायेगा ।

सच बोलूं तो मैं स्वयं भी इस ज्ञान से अनभिज्ञ हूँ कि मैं इस दिन कि प्रतीक्षा इतनी तीव्रता से क्यों कर रही थी । एक दिन ही तो था । दोस्तों से मिलना, अच्छा खाना खाना , एक अच्छा सांस्कृतिक कार्यक्रम देखना और फिर रोज़ कि भांति घर आ जाना । इसमें कुछ ख़ास नया तो है नहीं -हाँ, एक अच्छा सांस्कृतिक कार्यक्रम भले ही हमारे महाविद्यालय के 'ई.सी.ऐ.' कलांशों का अनेक अवसरों पर एक महत्त्वपूर्ण भाग होता है तथापि रोजाना नहीं होता ;अतएव वह शायद कुछ 'नयेपन' से युक्त कहा जा सकता  है ।

फिर एक अनुभूति हुई ।

यह वह दिन था जिसके लिए न जाने कितने हफ़्तों से मैंने अपने गृह जनों से आने के लिए आग्रहपूर्वक निवेदन किया था । एक दिन चाहिए था जब 'एल.एस.आर' में मैं अपने लिए नहीं अपने परिवार के लिए जाऊं । यूं तो अक्सर ही एक सामान्य परिवार कि भांति हमारा बाहर जाना होता है, पर एक शिक्षा स्थल अपर , किसी विशेष प्रयोजन से जाना अलग ही बात है।
एक उत्साह था -विद्यालय में हर 'पी.टी.एम् मीटिंग' पर अभिभावक साथ होते हैं, पर यह अनुभव महाविद्यालय में संभव नहीं होता- सब बड़े हो चुके होते हैं; माता-पिता बच्चे के कॉलेज जाना स्वयं भी पसंद नहीं करते ।और शायद यही बात उन 'बच्चों' को कॉलेज के बारे में सबसे अच्छी लगती है ।ख्ह्म्म ! ख्ह्म्म!

पर मुझमें यह उत्साह था । हम सबका वहाँ जाना और उस अविस्मरणीय अनुभूति का आत्मसात करना सच में मेरे लिए बहुमूल्य सिद्ध हुआ । और फिर मन में वही चिंताएं और आशाएं भरी हैं...कि आने वाले कल के बारे में आखिर करना क्या है? पर लगता है जब 'वो लोग' मेरे साथ हैं, तो कुछ न कुछ रास्ता तो अवश्य निकल कर आयेगा । तब तक के लिए, वे यादें ही बहुत हैं जो मुझे अत्यंत ही प्रेरित करती हैं -उनकी; उनके साथ
:)